उससे प्यार किया नहीं जाता
वो तो खुद ब खुद हो जाता है
इस बिरहन और मालिक का
ऐसा ही नाता है
जैसे दिन और रात
इक दूजे बिन अधूरे हैं
जैसे धरती और अम्बर
परस्पर अधूरे हैं
सनसनाती हवाएं हैं
उसके प्यार से सरोबार
सुंदर नजारे, फूलों की खुशबू में
छिपा होता है उसका प्यार
कुछ तो प्यार मे
हारकर भी जीत जाते हैं
कुछ जीत कर भी खुद को
हारा हुआ पाते हैं
उसके प्यार का नशा
जिसपर सवार होता है
वो उसमें डूब जाता है
फिर भी पार होता है
अगर तुम भी चाहते हो
उसी प्यार का एहसास
तो ढाई आखर प्रेम की
जगाओ खुद में प्यास
जब तुम बाबा को
दिल से चाहोगे
तो दूर होने पर भी
उसे पास ही पाओगे
हर चेहरे में उसे ढूंढना
तुम्हारा काम होगा
तुम्हारे होठों पर
बस उसका नाम होगा
एक सुन्दर,सुखद,निश्चल
और पवित्र एह्सास
हमेशा रहेगा
इस दिल के पास
पूरी कायनात की खुशियां
इस प्रेम में समाई
उससे प्रीत लगाओ
इंतजार में हैं साईं
जय साईं राम
http://forum.spiritualindia.org/sai-baba-poems/बाबा-की-यह-व्यथा-t21646.30.html
January 17, 2008, 05:24:37 AM