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जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को

ॐ सांई राम~~~

जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
मिल जाये तरुवर की छाया,
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है
मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे सांई राम~~~

भटक हुआ मेरा मन था अकेला,
मिल ना रहा था सहारा,
लहरों से लङती हुई नाव को,
जैसे मिल ना रहा हो किनारा,
मिल ना रहा हो किनारा...
उस लङखङाती हुई नाव को जो
किसी ने किनार दिखाया,
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है,
मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे सांई राम~~~

जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
मिल जाये तरुवर की छाया,
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है
मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे सांई राम~~~

जय सांई राम~~~

http://forum.spiritualindia.org/bhajan-lyrics-collection/जैसे-सूरज-की-गर्मी-से-जलते-हुए-तन-को-t21254.0.html

January 11, 2008, 08:04:02 AM

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